प्रचीन भारत के इतिहास में विज्ञान और गणित की भूमिका | Role of science and mathematics in the history of ancient India

प्रचीन भारत के इतिहास में विज्ञान और गणित की भूमिका | Role of science and mathematics in the history of ancient India

प्रचीन भारत के इतिहास में विज्ञान और गणित

  • भारत का विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान है
  • प्रचीन काल में धर्म और विज्ञान आपस में गुँथे-से थे
  • भारत में खगोल-विद्या में इसलिए बहुत प्रगति हुई कि ग्रह देवता माने जाने लगे थे प्राचीन समय में ग्रहों को देवता के रूप में देखते थेे और गति का गहन अवलोकन आरंभ हो गया।
  • ग्रहों को इसलिए भी अध्ययन करना आवश्यक हो गया कि उनका ़़ऋतुओं और मौसमों के परिवर्तनों से संबंध था और बिना इन परिवर्तनों का जाने खेती नहीं चल सकती थी।
  • व्याकरण और भाषा विज्ञान का उद्भव इसलिए हुवा के ब्राह्नण पुरोहित वेद की ऋ़चाओं और मंत्रों के उच्चारण की शुद्धता को बहुत महत्व देते थे। वास्तव में भाषा के संबंध में भारतीयों की वैज्ञानिक दृष्टि का प्रथम फल संस्कृति व्याकरण की रचना में पाया जाता है
  • 450 इ्र्र.पू. में संस्कृत भाषा के नियमों को सुव्यवस्थित रूप से संचित करके पणिनि ने व्याकरण लिखा जो अष्टाध्यायी के नाम से प्रख्यात है।
  • ईसा-पूर्व तीसरी सदी में आकर गणित, खगोल-विद्या और आयुर्विज्ञान तीनों का विकास अलग-अलग आरंभ हुआ।
  • गणित के क्षेत्र में प्राचीन भारतीयों ने तीन विशिष्ट योगदान किए-अंकन पद्धति,दशमिक पद्धति और शून्य का प्रयोग।
  • दशमिक पद्धति के प्रयोग का सबसे पुराना उदाहरण ईसा की पाँचवी सदी के आरंभ का है।
  • भारतीय अंकन पद्धति को अरबों ने अपनाया और उसको पश्चिमी दुनिया में फैलाया।
  • अंग्रजी में भारतीय अंकमाला केा अरबी अंक कहते है, किंतु अरबों ने स्वंय अपनी अंकमाला को हिंदसा कहा ।
  • पश्चिमी देशों मं इस अंकमाला का प्रचार होने के सदियों पहले से भारत मं इसका प्रयोग हुआ। इसका प्रयोग अशोक के अभिलेख में पाया जाता है, जो ईसा-पूर्व तीसरी सदी मे लिखे गए।
  • दशमिक पद्धति का प्रयोग सबसे पहले भारतीयो ने किया।
  • प्रख्यात गणितशास्त्री आर्यभट ने 476-500 ई. गणित से परिचित थे।
  • चीनियों ने दशमिक पद्धति बौद्ध धर्मप्रचारकों से सीखी , और पश्चिम जगत ने अरबों से सीखा।
  • शून्य का अविष्कार भारतीयों ने ईसा-पूर्व दूसरी सदी में किया। जब से शून्य का अविष्कार हुआ भारतीय गणितज्ञ इसको पृथक अंक समझने लगे और इस रूप में शून्य का प्रयोग अंकगणीत में होने लगा।
  • अरब देश मे शुन्य का प्रयोग सबसे पहले 473 ई. में पाया जाता है। अरबो ने इसे भारत से सीखा और यूरोप में इसे फैलाया।
प्रचीन भारत के इतिहास में विज्ञान और गणित की भूमिका | Role of science and mathematics in the history of ancient India
maths and science

  • बीजगणित में भांरत और युनान दोनों का योगदान रहा है, परन्तु पश्चिमी यूरोप में उसका ज्ञान यूनान मे उसका ज्ञान यूनान से नहीं बल्कि अरब से मिला, जिसे अरब में भारत से प्राप्त किया गया था।
  • हड़प्पा में बनी ईंट की ईमारतो से प्रकट होता है कि पश्चिमोत्तर भारत में लोगों को मापन और ज्यमिति का अच्छा ज्ञान था ,बाद में वैदिक लोगों ने इस ज्ञान से लाभ ईसा-पूर्व दूसरी सदी मे राजाओं के  उपयुक्त यज्ञवेदी बनाने के लिए आपस्तंब ने व्यावहारिक ज्यामिति की रचना की। इसमें न्यूनकोण , अधिककोण और समकोण का वर्णन किया गया है।
  • आर्यभट ने त्रिभुज का क्षेत्रफल जानने का नियम निकाला जिसके फलस्वरूप त्रिकोणमिति का जन्म हुआ इस काल का सबसे प्रसिद्ध पुस्तक है सूर्यसिद्धांत। समकानीन प्राचीन पूरब में इस तरह की कोई दुसरी कृति नहीं पाई गई है।
  • खगोलशास्त्र में आर्यभट और वराहमिहिर दो मान विद्वान हुए।
  • आर्यभट पँाचवी सदी में हुए और वराहमिहिर छठी सदी में।
  • आर्यभट ने बेबिलोनियाई विधि से ग्रह-स्थिति की गणना की। उसने चंन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के कारणों को पता लगाया।
  • माना जाता है कि उसने बताया कि सूर्य स्थिर है तथा पृथ्वी घुमती है।
  • आर्यभट की पुस्तक का नाम आर्यभटीय है।
  • वराहमिहिर की सुविख्यात कृति कृति है वृहत्संहिता। यह पुस्तक ईसा की छठी सदी की है।
  • वराहमिहिर ने बताया कि चंन्द्र पृथ्वी का चक्कर लगाता है और पृथ्वी सुर्य का चक्कर लगाती है उसने ग्रहों के संचार और अन्य खगोलीय समस्याओं के अध्ययन में यूनानियों के अनेक कृतियों का सहारा  लिया।
  • यद्यपि भारतीय खगोलशास्त्रियों ने यूनानियों के ज्ञान से लाभ उठाया, तथापि उन्होंने इस ज्ञान को आगे बढाया और ग्रहों की गति के अवलोकन में इस ज्ञान का प्रयोग किया।
  • प्रयोगिक क्षेत्रों में , भारतीय शिल्पियों ने रसायनशास्त्र की प्रगति में बहुंत योगदान किया।
  • भारतीय रंगरेजों ने टिकाउ रंगो का विकास किया तथा नीला रंग ढूँढ निकाला। पहले बताया जा चुका है कि किस प्रकार भारतीय लोहारों ने दुनिया में इस्पात का सर्व प्रथम निर्माण किया।

 

Science and Mathematics in the history of ancient India

 

  • India has a significant contribution in science
  • In ancient times, religion and science were interwoven.
  • In India, there was so much progress in astrophysics that the planets began to be considered gods, in ancient times the planets were seen as deities and intense observation of motion began.
  • It was also necessary for the planets to study that they were related to the changes in the seasons and the seasons and without these changes, it could not be cultivated.
  • The emergence of grammar and linguistics, therefore, the Brahmin priests of Hawaa gave great importance to the purity of the words and words of the Vedas. In fact, the first fruit of the scientific vision of Indians in relation to language is found in composition of grammar
  • 450 c. By accumulating the Sanskrit language rules in a systematic manner, Panini wrote the grammar which is known as the name of the Ashtadhyayi.
  • By the third century BC, the development of mathematics, astrophysics, and all three of the sciences started separately.
  • In the field of mathematics, ancient Indians made three distinct contributions-using marking method, decimal method and zero.
  • The oldest example of the use of decimal system is the beginning of the fifth century AD.
  • The Indian marking system was adopted by the Arabs and spread it to the Western world.
  • The Indian numeral in English is called Kya Arabi, but the Arabs themselves call their numeral Hindas as Hindas.
  • It has been used in India since centuries before it was published in Western countries. It is used in the records of Ashoka, written in the third century BC.
  • The decimal system was first used by the Indians.
  • Famous mathematician Aryabhatta was familiar with the 476-500 AD mathematics.
  • The Chinese learned the tenth method from Buddhist preachers, and the West has learned from the Arabs.
  • Zero was invented by Indians in the second century BC. Ever since the invention of zero, the Indian mathematician began to understand it as a separate point, and in this form zero use of arithmetic was used.
  • The first place in the Arab world is found in 473 AD. Arbo learned it from India and spread it to Europe.
  • Both Bhantru and Yunnan have been contributing to Algebra, but their knowledge in Western Europe was not known to Greece in Greece but from Arabia, which was obtained from India in Arabia.
  • Brick buildings in Harappa show that people in northwestern India had a good knowledge of measurement and geometry, later Vedic people benefited from this knowledge in order to make suitable Yajnevadis of kings in the second century BC, Composed of In this, the angle, the right angle and the right angle are described.
  • Aryabhata laid out the rule to know the area of ​​the triangle, which resulted in the birth of trigonometry. The most famous book of this period is the Suryasiddhit. In the ancient East there is no other such kind of work that has been found.
  • In Astrophysics, Aryabhata and Varahamihira were two valued scholars.
  • Aryabhata took place in the fifth century and Varahamihira in the sixth century.
  • Aryabhatta calculated the planetary state from Babylonian method. He explored the causes of lunar eclipse and solar eclipse
  • It is believed that he told that the sun is stable and earth is rotated.
  • The name of Aryabhata's book is Aryabhatiya.
  • Varahamihira's legendary work is the extension of the magnum opus. This book is from the 6th century BC.
  • Varahmihir told that the moon revolves around the earth and the earth revolves around the Sun, it supports many works of Greek works in the study of planets and other astronomical problems.
  • Although Indian astronomers benefited from the knowledge of the Greeks, they carried this knowledge forward and used this knowledge in observing the motion of the planets.
  • In the experimental areas, Indian artisans made the most of the progress in chemistry.
  • Indian Rangers developed durable colors and found blue colors. It has been mentioned earlier how Indian blacksmiths made the first of all the steel in the world.
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