छत्तीसगढ़ के कोल कोरकू सहरिया जनजातिया |Total Korku Sahriya tribe of Chhattisgarh Korku Sahriya tribe of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ के कोल कोरकू सहरिया जनजातिया |Total Korku Sahriya tribe of Chhattisgarh Korku Sahriya tribe of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ के जनजातियाँः-

छत्तीसगढ़ के कोल जनजातिः-

  • छत्तीसगढ़ में कोल जनजाति की संख्या बहुत ही कम पाया जाता है।
  • कोल जनजाति प्रमुख रूप से श्रमिक है ये जनजाति अधिकतर मजदुरी काम काज करते है।
  • कोल जनजाति के प्रमुख दो भाग हैः- राउतिया और राउतेले।
  • इसमें राउतिया स्वंम को अधिक उच्च मानते है
  • कोल जनजाति का उल्लेख अनेक हिुन्दू धर्मग्रथों में मिलजा है। इनमंे मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण , ऋग्वेद ,महाभारत , रामायण, रामचरित मानस प्रमुख है।
  • कोल हिन्दू धर्म को मानने वाला जनजाति है।
  • कोल होली , दीपावली, नवदुर्गा, रामनवमी प्रमुख हिन्दू त्यौहारों को मानते है।
  • कोल जनजाति के लोगों की अजीविका का प्रमुख साधन खेती मजदुरी और कुछ नौकरी भी करते है।
  • कोल लोकप्रिया जनजाति है।उनका कोल दहरा नृत्य लोकप्रिय है।
  • छत्तीसगढ़ के अलावा कोल जनजाति मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र ,उडी़सा और उत्तरप्रदेश राज्यों में भी निवास करती है।
  • आदिवासाी लोककला अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद के प्रकाशन सम्पदा के अनुसार कोल जनजाति के नामकरण और कोल शब्द के संबंध में विद्वानों के कई मत है।
  • कुछ विद्धानों का कहना है कि कोल  या मुण्डा अपने बोली मे अपने सदस्यों को ’हर,’होर’ तथा ’कोरो’ नाम से पुकारते है। इन शब्दों का अर्थ होता है मानव। यह संभव है कि आर्य भाषा-भाषियों ने  जब ’होर’ या ’कोरो’ शब्द सुनें होें तो उन्होने उन लोगों केा ’कोल’ नाम दिया गया ।
  • संस्कृत में कोल शब्द का अर्थ सूकर होता है।
  • वैज्ञानिक दृष्टि से ’कोल ’ की उत्पत्ति ठीक नहीं है , कोल जनजाति भी इन शब्द पर अपना विरोध प्रकट करते है।
  • संभव है कि ’कोल’ शब्द का उद्भव मण्डारी हो , होर या होरेा से हुआ है कि कोल की उत्पत्ति कोरा या कोरार से हुई है, जो कि छोटी नागपुर के खरिया जनजाति के द्वारा मुंडा जनजाति के लिए दिया गया संबोधन है।

 
छत्तीसगढ़ के कोल कोरकू सहरिया जनजातिया |Total Korku Sahriya tribe of Chhattisgarh
 Korku Sahriya tribe of Chhattisgarh

 

छत्तीसगढ़ के कोरकू जनजातिः-

  • छत्तीसगढ़ में कोरकू जनजाति की आबादी कम है। खेती और मजदुरी पर नर्भर रहने वाले कोरकू जंगली क्षेत्र में रहकर अपना जीवन-यापन करना पसंद करते है।
  • कोरकू जनजाति चार समुहों में पाए जाते है यह है रूमा, पोतड़िया, दुलाप और बोवई।
  • हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले कोरकू होली, दीपावली के साथ ही देव, दशहरा, डोडवली, जिरोती, पाला आदि त्यौहारों को केारकू जनजाति मनाते है।
  • कोरकू जनजातियों में विवाह के चार पद्धतियां प्रचलित है जो निम्न हैः-
  •   (1) लमझना या घर दामाद
  •   (2) चिथोड़ा
  •   (3) राजी बाजी
  •   (4) विधवा और तलाक विवाह
  • आदिवासी लोककला अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद के प्रकाशन सपंदा के अनुसार कोरकुओं की उत्पत्ति के बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं है और न ही इनाक कोई लिखित इतिहास मिलता है। यानी केवल इनके पूर्वजों द्वारा कही गई पौराणिक गाथाओं से ही मालूम होता है कि इसी रचना कैसे हुई।
  • वैसे कोरकू जनजाति अपने आपको रावण का वंश और महादेव को अपनी सृष्टि के रचयिता मानते है क्योंकि कोरकू जनजाति की इस मान्यता के पिछे इनकी दैवीय उत्पत्ति की एक विस्मयकारक गाथा है जिस आधार पर इनके प्राचीन इतिहास के बारे में हम झीनी झलक पा सकते है
  • इनके अनुसार एक समय लंका का राजा रावण वन-विहार करता हआ विध्यांचल और सतपुड़ा अंचल में आया उसने देखा कि इतना रमणीय अैार वन संपदाओं से अच्छादित स्थल निर्जन है।
  • रावण ने अपनी इष्टदेव महादेव से प्रार्थना की कि वे इस नर्जन क्षेत्र में सृष्टि का निर्माण कर आबाद करे। भगवान प्रसन्न हुए । उन्होंने अपने काज दूत कागेश्वर को भंवरगढ और सांवलीगढ़ के मध्य पर्वतीय स्थल से लाल मिट्टी लाने को कहा।
  • महादेव ने इस मिट्टी से स्त्री और पुरूष की आकृतियां बनाकर उन्हें निर्जन में रखा। वे उन मानवाकृतयों में प्राण फूकने ही वाले थे कि इन्द्र ने नाराज होकर तीव्रगामी घोड़े भेजे , उन घोड़े ने मानवाकृतियों को नष्ट कर दिया।
  • भगवान महादेव ने भी क्रोध में आकर मिट्टी से कुत्ते के पुतले बनाए और तुरन्त उसमें जान डाल दी इस आक्रमक और हिंसक कुत्तो ने इंन्द्र के घोड़े को भगा दिया।
  • भगवान महादेव ने पुनः स्त्री और प्ररूष की आकृति बनाकर उसमें प्राण फूंक दिया।
  • महादेव ने पुरूष के नाम मूला और स्त्री का नाम मुलाई रखा।
  • दो दिन के अथक प्रयासों के बाद महादेवजी द्वारा बनाए गंये ये मूला और मुलई ही कोरकू जनजाति के आदि पुरूष हुए। कोरकू इन्हें अपने पुर्वज मानते है। इसी के साथ कोरकू रावण और कुत्ता को पूजते है।
  • एक मान्यता के अनुसार महादेव न उसी समय कई प्रकार के पेड़-पौधे बनाए। कारेकू माहुल अर्थात महुवा से सीडू से दाय बनाते है।
  • एक किंवदन्ती के अनुसार कौआ या कागदूत महादेव के लिए मिट्टी जहां से लाया था कोरकू उसी जमीन को अर्थात सांवलीगढ़ या भंवरगढ़ को अपना उत्पत्ति सांवरीगढ़ के रहने वाले है। ऐसे वैसे कोरकू नहीं है , इसे एक कोरकू गीत में आज भी गाते है।
  • एक कोरकू मान्यता के अनुसार कोरकू विन्ध्य और सतपुड़ा के जंगलों में जड़े खोदने थे या कोरते थे, एसलिए कोरकू कहलाए।

छत्तीसगढ़ की सहरिया जनजातिः-

  • छत्तीसगढ़ में सहरिया जनजाति की जनसंख्या बहुत कम है।
  • सहरिया जनजाति खेतिहर मजदूर के रूप में अपना जीवन-यापन करते है।
  • सहरिया जनजाति हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते है।
  • सहरिया जनजाति अपने आजीविका के लिए वनोपज संग्रह, जड़ी-बूटियांे की खेती और मजदूरी पर निर्भर रहते है।
  • सहरिया जनजाति जड़ी-बुटीयों की गुण-दोष पहचान कर अनेक बिमारियों का इलाज भी करते है।
  • सहरिया जनजाति जंगलोें में विचरण करने के कारण शिकार उनका शौक है। वे जंगलों से जडी-बुटीया निकाल कर शहरों में बेच कर अपना जीवन यापन भी करतें है।
  • सहरिया जनजाति कला-संस्कृति की दृष्टि से भी संम्पन्न है
  • सहरिया जनजाति की उत्पत्ति के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है। सहरिया अपने आप को खुटिया पटेल कहते है। सहरिया जनजाती रोलापितान प्रजाति की संपूर्ण पहचान रखने  वाली आदिम जनजाति है।
  • कुछ लोगों का मानना है कि सहरिया शब्द की उत्पत्ति फारसी के सहा शहर से हुई है। जिसका मतलब वन होता है।
  • सहरियों के रहने क स्थान या बसाहट को सहराना कहते है।
  • सहराना की मुखिया पटेल होता  है। वह पीढ़ी दर पीढ़ राज करता है
  • सहरिया पितृसत्तात्मक समाज है इसमें पुरूष का दर्जा स्त्री से उपर होता है।

  Tribe of Chhattisgarh

Coal tribe of Chhattisgarh:



  • The number of Cole tribe in Chhattisgarh is very rare.
  • Coal tribes are mainly workers, these tribals mostly work for wages.
  • The main component of the Coal tribe is: - Routia and Routele.
  • In this Rautia considers Swam more high
  • Cole tribe is mentioned in many Hindu religious groups. Inmeme Matsya Purana, Agni Purana, Rigveda, Mahabharata, Ramayana, Ramcharit Manas are prominent.
  • Cole is a tribute to Hindu religion.
  • Cole Holly, Deepawali, Navdurga, Ramnavmi consider major Hindu festivals.
  • The main means of livelihood of the people of Coal tribe also do farming and some jobs.
  • Cole is popular in the tribe of Lokpriya. Their dance darling dance is popular.
  • Apart from Chhattisgarh, the Coal tribe also resides in the states of Madhya Pradesh, Maharashtra, Orissa and Uttar Pradesh.
  • According to the publication property of the Adivasi Folk Art Academy, Madhya Pradesh Cultural Council, there are many opinions of scholars regarding the name of the Coal tribe and the word of the Coal.
  • Some scholars say that Coal or Munda calls its members in the name of 'Hare', 'Hore' and 'Koro' in their dialects. These words mean human. It is possible that when the Aryans speaking the language, when they heard the word 'Hore' or 'Koro' they were named 'Cole'.
  • The word koll in Sanskrit means sukur.
  • In the scientific sense the origin of 'coal' is not good, the Coal tribe also expresses their opposition to these words.
  • It is possible that the word 'Cole' is the origin of the word Mandari, Hoor or Hora, that the origin of the coal is from Korra or Korar, which is the address given to Munda tribe by the Kharia tribe of small Nagpur.

Korku Tribe of Chhattisgarh-



  • The population of Korku tribe in Chhattisgarh is low. Narkhar, who lives on farming and wages, likes to live his life while living in a wild area.
  • Korku tribe is found in four groups; it is Ruma, Potdia, Dulap and Bawaii.
  • Korku Holi, who has faith in Hinduism, celebrates Karku tribe with Deepawali and festivals like Dev, Dussehra, Dodvali, Jiroti, Pala etc.
  • Four methods of marriage are common among Korku tribes, which are:
  •   (1) Lizziness or home son-in-law
  •   (2) Chithoda
  •   (3) persuade
  •   (4) Widow and divorce marriages
  • According to Sapanda, publication of the Tribal Folk Academy, Madhya Pradesh Cultural Council, there is no concrete evidence about the origin of the coconut and neither does it have any written history. That is, only by the mythical stories spoken by their ancestors, they seem to know how this composition is done.
  • However, the Korku tribe consider themselves the descendants of Ravana and the makers of Mahadev as their Creator, because behind this belief of Korku tribe, there is a wonderful saga of their divine origin, on which basis we can get a glimpse of their ancient history.
  • According to them, once the King of Lanka, Ravana came to Varanjal and Satpura zones, which was one of the vans, he saw that the well-marked place with so much luxury and forest wealth was a deserted place.
  • Ravana prayed to his Ishtadev Mahadev that he would create and construct the universe in this deserted area. God was pleased. He asked his Kaj messenger to bring red soil from the hill station between Bhanangarh and Sawalgarh.
  • Mahadev made the figures of women and men from this soil and kept them in a deserted place. He was about to die in those human beings that Indra was angry and sent a fast-moving horse, those horses destroyed manmukhs.
  • Lord Mahadev also came in anger and made dog puppies from soil and instantly put his life in it. This aggressive and violent dog drove the horses of Indra.
  • Lord Mahadev again made a shape of a woman and a man and breathed life into it.
  • Mahadev named the mula and the woman's name in the name of men.
  • After two days of untiring efforts, these mules and mules made by Mahadevji were men of Korku tribe. Korku treats them as their ancestors. With this, Korku worship Ravana and dog.
  • According to one belief, Mahadev made several types of trees at the same time. Kareku makes the mahuja from Mahuva to Cedu.
  • According to a legend, Korku or Magician brought the soil from Mahadev to Korku, the same land, which is the origin of Sawalgarh in Sawaligarh or Bhavanagarh. There is no such cocoon, even today it sings in a korku song.
  • According to a Korku accent, the Korku Vindhya and Satpura were in the jungles of the jungle to digging or sculpting, so to say korku.

Saharia tribe of Chhattisgarh:



  • The population of Sahriya tribe in Chhattisgarh is very low.
  • Saharia tribes make their living as agricultural laborers.
  • Saharia tribes worship Hindu Goddesses.
  • Saharia tribes depend on forest produce for their livelihood, cultivation of herbs and wages.
  • The Saharia tribe also recognizes the properties of herbs and treats many diseases.
  • Savaria tribe is hobbled by hunting for wildlife. They also carry out their lives by removing herbs from the forests and selling them in cities.
  • Saharia tribe is also present in terms of art and culture.
  • There is no clear information about the origin of Saharia tribe. Sahria calls itself Khutia Patel. The Saharia tribe is a primitive tribe with a complete identification of Rolatan species.
  • Some people believe that the word Sahria is derived from the six cities of Persian. Which means forest is one.
  • The place for living is called Saharan.
  • The head of Sahranana is Patel. It reigns over generations
  • Saheria is patriarchal society in which male status is above woman.
  •  


Post a Comment

0 Comments